राहें
कुछ उम्मीदें लेके लम्बी राहों पे चल रहा था मैं,
दूर तक देखा तो समझ आया, उम्मीदें होना ही फिजूल था ।
क्या मिला क्या खोया ये तो मालूम नहीं मुझे,
मगर ये समझ आया की कोई हिसाब लगाना फिजूल था ।
रास्तो की हस्ती और सांसों की मस्ती समझना जरूरी था,
मगर राहों पे खुद को गिरने से बचाना फिजूल था ।
हर रास्ते को कहानी बनाके जी पाना कमाल था,
मगर हर कहानी को याद रखना फिजूल था ।
Nice..
ReplyDeleteThanks
DeleteSahi👍👍
ReplyDeleteThank you
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