राहें

 कुछ उम्मीदें लेके लम्बी राहों पे चल रहा था मैं,

दूर तक देखा तो समझ आया, उम्मीदें होना ही फिजूल था ।

क्या मिला क्या खोया ये तो मालूम नहीं मुझे,

मगर ये समझ आया की कोई हिसाब लगाना फिजूल था ।

रास्तो की हस्ती और सांसों की मस्ती समझना जरूरी था,

मगर राहों पे खुद को गिरने से बचाना फिजूल था ।

हर रास्ते को कहानी बनाके जी पाना कमाल था,

मगर हर कहानी को याद रखना फिजूल था ।

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