एक सुहागरात

अस्वीकरण - इस कहानी में अश्लीलता का कोई अंश नहीं है। इसमें बस प्रेम के भिन्न आयामों को दर्शाने का प्रयास किया गया है।

 

प्रेम एक अद्भुत अन्वेषण, एक अद्भुत अलंकार, एक अद्भुत स्वीकरण।

वो बड़ी शांत उस कमरे में बैठी थी। कमरे में कोई और नहीं था। उस कमरे की सजावट उस रात के होने वाले जश् जैसी थी क्योंकि उस जैसी रात उनके जीवन की पहली रात थी। आज उसे अपने नए अनुभव की नयी सीमा मिलने वाली थी। वो रात सुहागरात थी। उस कमरे में बहुत कम रोशनी थी और मंद लाल रोशनी बड़े ही उच्च स्वरों में बिखर रही थी। उस कमरे का सबसे ज्यादा भाग जिस चीज ने घेरा था वो था बिस्तर, जिसके ऊपर फूल ही फूल बिखरे थे और उसके हर कोने पर ढेरों फूलों की लड़े अंत हो रही थीं जो की पूरे बिस्तर को हर तरफ से घेरे हुए थीं और वो उसी बिस्तर पर बैठी थी। ऐसा लग रहा था की जैसे वो एक छोटे मगर बड़े ही आलीशान से सपनों के महल में बैठी हो। वो बड़ी सकुचाई सी अपने आप को समेटे बैठी थी मगर फिर भी उसके वस्त्र इस कदर बिस्तर पर जगह घेरे थे मानो वो आज झूम के नृत्य करना चाहते हों। वो एक सीधी साधी सी कन्या थी जो आज किसी ख्याल में नहीं खोयी थी क्योंकि वो तो कुछ सोच ही नहीं पा रही थी। वो मचल भी रही थी, वो सकुचा भी रही थी, वो इंतजार भी कर रही थी और वो घबरा भी रही थी। उसकी धड़कनें भी सामान्य नहीं थीं। कुछ ऐसी थी उसकी स्थिति उस वक्त।

वो गया। कमरे का दरवाज़ा बंद था। वो धीरे से दरवाज़ा खोलकर अंदर आया और उसने सामने बैठी लड़की को देखा। दरवाज़े के खुलने की आवाज़ से उस लड़की का भी ध्यान उस ओर गया और दोनों की नज़रें मिलीं। जब उन नव विवाहित युवाओं ने एक दूसरे को देखा तो जैसे उनके बीच का ये संसार कुछ पलों के लिए मानो रुक गया था। शादी के बाद ये पहली बार था जब उन दोनों ने एक दूसरे को इतनी देर के लिए देखा था। उस लड़के को तभी याद आया की उस कमरे का दरवाज़ा खुला है। उसने अपनी नज़र हटाई और घूम के दरवाज़ा बंद करने लगा। दरवाज़ा बंद करते समय उसने एक बार फिर घूम के लड़की को देखा मगर इस बार वो इधर नहीं देख रही थी। बल्कि उसने तो अपनी नज़र को अपने लहंगे में लगे एक मोती पे टिका लिया था। उस मोती से उसका कोई सम्बन्ध नहीं था मगर जैसे की किसी भावना से बचने का वो एक बहाना था।

वो दरवाजा बंद करके मुड़ा और उसकी ओर बढ़ा। वो दोनों ही इस बात से अंजान थे की आने वाले पलों में उनके अनुभव कैसे होंगे और शायद यही उन्हें उन लम्हों में ढकेल रहा था। वो आगे बढ़ा और उसके सामने बैठ गया। जब वो बैठा तो शायद उस लाल जोड़े में बैठी लड़की का वो मोती कहीं खो सा गया और उसने अपनी नज़रें उठाईं। वो लड़के के चेहरे को तो देख सकी लेकिन अब वो उसके सामने बैठे व्यक्ति के हर अंग का मोयना करने लगी। शायद वो पहली बार था जब वो किसी लड़के के इतना करीब आई हो। वो लड़का बड़े शांत भाव से उसके चेहरे को देख रहा था। उसकी आँखे उस लड़की की आँखों से फिर मिलना चाहती थी। वो थोड़ी देर कुछ बोले और एक दूसरे को यूँ ही देखते रहे।

कुछ देर बाद उस लड़के ने उस कमरे में छाई शांति को भंग किया और पूछा "तुम कैसी हो? ठीक हो? ज्यादा थकी तो नहीं हो?" इन प्रश्नों को सुनकर वो मुस्कुराई पर कुछ कह सकी, बस सर हिला के "हूँ" में ही जवाब दे दिया। उसके सर हिलाने से उसके गहनों में ध्वनि हुई जो उसकी स्वयं की आवाज़ से तेज़ ही थी। उसकी मुस्कुराहट एक मंज़ूरी की तरह थी जिसे वो समझ गया। अब उसने बड़े प्यार से अपनी पत्नी की ठोड़ी के नीचे दो उंगलियां लगाईं और उसके चेहरे को ऊपर किया और उनकी नज़रें मिली। वो एक दूसरे को ऐसे देख रहे थे जैसे उनके सामने कोई खजाना हो, कोई अनमोल और अपेक्षित खजाना। वो एक दूरसे को ऐसे देख रहे थे मानो वो एक दूसरे की छवि में या तो डूब जाना चाहते थे और या तो उस छवि को खुद में बसा लेना चाहते थे पर दोनों में से कुछ भी हो नहीं पा रहा था।

अब उस लड़के ने लड़की के सर से पल्लू हटाया, मांग टीका हटाया, कानों के कुण्डल और गले का हार भी उतारा। लड़की तो बस अंजान सी उसे ये करता देखती रही। और फिर लड़के ने उसे लिटा दिया और लड़की अब भी उसे वैसे ही देखती रही। वो दोनों एक बार फिर एक दूसरे को देखने लगे। अब लड़के ने अपनी तर्जनी उंगली से उसके माथे को छुआ, प्यार से। अब उसकी नजर अपनी उंगली पर थी और लड़की की नज़र लड़के की आँखों में थी। उसने धीरे धीरे अपनी उंगली को खिसकाया और मस्तक के मध्य से वो पंहुचा आँखों के मध्य में जहाँ एक बार फिर उनकी नज़रें मिलीं। लड़के ने अपना ध्यान उन आँखों से हटाया और एक बार फिर अपनी उंगली को देखने लगा। अब वो उंगली को उन आँखों के मध्य से गालों पर ले गया और उन कोमल गालों पर अपनी उंगली फेरने लगा। फिर उसकी उंगली पहुँची नाक और होठों के मध्य भाग में जहाँ उसकी उंगली ने होटों को धीरे से छुआ। वह उंगली को होटों के मध्य में धीरे से लाया और फिर बड़ी कोमलता से उंगली को उन होठों पर फेरते हुए होठों के एक छोर तक गया और फिर वैसे ही दूसरे छोर पर गया। और फिर वो उंगली को होठों के मध्य में लाया मगर इस बार जरा दबाव देते हुए, निचले होठ को मोड़ते हुए। मानो वो उस शरीर के हर अंग तक पहुँचना चाहता था, हर अंग को देखना चाहता था, हर अंग पर अपनी छाप छोड़ना चाहता था। होठों से फिर वो ठोड़ी पर आया और फिर गले से धीरे-धीरे नीचे उतरने लगा। वह लड़की यह सब होते बस देख रही थी पर कुछ भी कर पा रही थी। वह उंगली गले से हृदय के मध्य पर और वहाँ से उदर तक पहुँची जहाँ उसने नाभी के चारों ओर फिरकर एक घेरा बनाया। उदर से वो दाहिने पैर की ओर आई जहाँ वह गुठने से एड़ी की ओर बढ़ने लगी। एड़ी की तरफ बढ़ाते समय उसकी उंगली पायल से टकरा गई। बस इस एक क्षण ने सब बदल दिया।

वो जैसे स्तब्ध रह गया। अपने कौंधते विचारों की सत्यता जानने के लिए उसने फिर से पायल बजाई। मानो अभी तक तो वो अभिनय कर रहा था और उस पायल की आवाज़ से वो उस किरदार से बहार गया। वो भूल गया था की उसके सामने उसकी पत्नी है और आज उनकी सुहागरात है। उस समय उसके साथ वो पायल थी और उसके विचार थे। उसकी आँखों में आँसू गए और वो अचानक से उठा और उस कमरे से बाहर निकल कर छत पर गया। वह खुले आसमान के नीचे छत के एक कोने में जाकर अपने आप को समेटकर बैठ गया। आँसुओं से भरी आँखों से वो आसमान में टिमटिमाते तारों को देखने लगा।

उसने जब अपनी जवानी के दिनों में कदम ही रखा था तभी उसे एक लड़की से प्यार हो गया था। वो उसे पूरे दिल और सच्ची भावना से चाहता था। वो लड़की भी उसे चाहने लगी थी। वो अक्सर कहा करता था की उसकी खिलखिलाहट उसे पायल की मधुर खन-खन सी लगती है। प्रेम भरा कुछ समय व्यतीत होने के बाद उन्हें एक दूसरे से दूर होना पड़ा। उनकी जिंदगी में कुछ ऐसा हुआ की वो फिर कभी एक दूसरे से मिल नहीं सके। वक्त के साथ यूँ तो उस प्यार की यादें धुंधली पड़ गई थीं मगर आज जब उसने उस पायल की आवाज सुनी तो उसे वही हँसी याद गयी, वही प्यार याद गया और वो अपने आप को रोक सका।

वह स्त्री जो अपने पति के बीते जीवन के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानती थी, वह भी पति को परेशान देख कर भूल गयी की ये उनकी सुहागरात है। वह अपने बिस्तर से उठी और छत पे अपने पति के पास जाके बैठ गयी। उसके मन में अपने पति के लिए कोई प्रश्न नहीं था, मानो वह सब कुछ जानती थी और या तो उसमें सब कुछ स्वीकार कर लेने की क्षमता थी, इसीलिए वह उस वक्त भी व्याकुल हुई। उसने अपनी पति के चेहरे पर बहे आँसुओं को पोंछा और लड़के ने बिना झिझके अपनी पत्नी की गोद में सर रख दिया और तारों को देखने लगा।

उस रात वो तारों में अपनी प्रेमिका को ढूंढते हुए अपनी पत्नी की गोद में सो गया और वो पत्नी अपने पति के चेहरे को प्रेम से निहारते हुए उस छत पर ही सो गयी।

प्रेम एक अद्भुत अन्वेषण, एक अद्भुत अलंकार, एक अद्भुत स्वीकरण।

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इस ब्लॉग और पिछले सभी ब्लोग्स के संपादन में सहयोग करने के लिए मेरी मित्र अंशुल गुप्ता को बहुत-बहुत धन्यवाद।

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