समाज का एक विचार
समाज अगर एक व्यक्ति होता तो "हाथरस" और उसके जैसे अनेक बर्बरता, अन्याय और दुराचार पूर्ण काण्ड को देख शायद ये कहता-
ना जाने कब आग बनके बरसूंगा
बातें तो बहुत हैं करने को
ना जाने में क्या करके गुज़रूंगा ।
आग को बहुत दूर से जलते देखा है मैंने
फिर भी उसकी तपिश में झुलसता हूँ
राख बन जाने से पहले
ना जाने कब आग बनके बरसूंगा।
यूँ ही सिसक कर मैं
हर रोज बिखरता हूँ
पूरा बिखर जाने से पहले
ना जाने कब खुद से नजरें मिला पाऊँगा ।
उजाले की ओर बढ़ने की की थी शुरुवात मैंने
अंधेरों की ओर बढ़ता दिख रहा हूँ
अंधेरों में खो जाने से पहले
ना जाने कब अंधेरों से निकल पाऊँगा ।
ये जो हर रोज हो रहा है
नया सामान्य बन रहा ये
इसे सामान्य बन जाने से पहले
ना जाने कब इसे रोक पाऊँगा ।
Nice sir
ReplyDeleteVery true... people need to have reality check
ReplyDeleteNice lines
ReplyDeleteHeart touching..
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